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फिर से मराठी झंडा

26 मार्च

इससे पहले वाले ब्लॉग में मैने ’शाळा’ फिल्म के बारे में लिखा था। उसी फिल्म को आज सर्वोत्कृष्ट मराठी फिल्म के राष्ट्रीय खिताब से नवाज़ा गया है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस बार मराठी फिल्मों ने फिर अपना झंडा फिरसे लहरा दिया। बॉलिवूड की फिल्में कितनी भी रंगरंगीन हो, वे दर्ज़ेदार फिल्मों की पंक्ति में नहीं बैठ सकती, यही इन फिल्म पुरस्कारों ने साबित किया है। बॉलिवूड को सिर्फ़ विद्या बालन के रूप में सर्वोत्तम अभिनेत्री का पुरस्कार मिल गया। यही उन के लिए खुशी की बात होगी…!!!

बालगंधर्व, देऊळ तथा शाळा ये पिछले साल की बेहतरीन मराठी फिल्में रही हैं। मराठी भाषिक इन फिल्मों को नहीं देखते, इन्ही कारणवश मराठी फ़िल्मे महाराष्ट्र में ही बहुत कम चल पाती हैं। लेकिन मराठी दर्शक देखे या ना देखे, फिल्म पुरस्कार इन फ़िल्मों को अपना दर्जा प्रदान करते ही है। बालगंधर्व के रूप में लगातार दुसरी बार मराठी फ़िल्म को सर्वोत्तम गायक का पुरस्कार मिल गया। पिछले साल सुरेश वाडकरजी को ’मी सिंधुताई सपकाळ’ फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया था। इस साल आनंद भाटेजी ने यह पुरस्कार प्राप्त किया। आजकल बॉलिवूड फ़िल्मों में कही बेसुरे गायक पैदा हो गये है और गीतों में बहुत ज़्यादा संगीत होने के कारण उन की आवाज़ कोई नहीं सुनता। लेकिन प्रादेशिक फ़िल्मों में आज भी कई बेहतरीन गायक अपनी अदाकारी दिखा रहे है। सही गायकी क्या होती है? इस का उत्तर ’बालगंधर्व’ के रूप मे हम को सुनने को मिलेगा। ’बालगंधर्व’ फ़िल्म के अल्बम में तकरीबन सोलाह गानें हैं। इन में से कई गीत आनंद भाटे जी ने गाए है। और इस संगीतबद्दध किया है, कौशल इनामदार ने। श्रवणीय संगीत की वजह से यह फ़िल्म देखने थना ’सुनने’ लायक बनाई गयी है। इस फ़िल्म को संगीत देना बहुत बड़ी चुनौती थी। कौशलजी तथा आनंद भाटेजी इस फ़िल्म के लिए श्रोताओं सौ प्रतिशत अंक पाने के हकदार है। इसी फ़िल्म ने सर्वोत्तम मेक-अप (रंगभुषा) का राष्ट्रीय ख़िताब भी हासिल किया है। १०० साल पहले का चित्रण फ़िल्म में दिखाना तथा किसी पुरूष को पूरी तह ’नौवारी’ साड़ी में परदे पर पेश करना बहुत ही कठीण था। लेकिन विक्रम गायकवाड ने यह चुनौती स्वीकार कर सही ढंग से ’बालगंधर्व’ परदे पर दिखाया है। सहयोगी स्टाफ सही तरिके से चुनना तथा उनसे काम करवाना भी आसान नहीं था। इस के लिए मैं निर्देशक रविंद्र जाधव को बधाई देना चाहता हूं।

सर्वोत्तम फ़िचर फ़िल्म का ख़िताब पानेवाली फ़िल्म ’देऊळ’ को मराठी दर्शको ने पहले ही दाद दी हैं। इस साल की वह सर्वोत्तम मराठी फ़िल्मों में से थी, इसमें कोई आशंका नहीं थी। उमेश कुलकर्णी व्दारा निर्देशित इस फ़िल्म में कई बार ऐसा लगता हैं, की कही ये सत्य कहानी पर आधारित तो नहीं? अपने देश में कई जगह श्रद्धा के आधार पर मंदिरों का निर्माण हुआ है और यह जगह आज सोने का अंडा देनेवाली मुर्गीयों जैसी बन गयी है। इसी थीम पर ’देऊळ’ ने प्रकाश डाला है। फ़िल्म के कथाकार तथा मुख्य अभिनेता गिरिश कुलकर्णी का इस फ़िल्म के यश में सबसे बड़ा हाथ है। गिरिश को इस फ़िल्म ने सर्वोत्तम कथाकार, सर्वोत्तम डायलॉग (संवाद) तथा सर्वोत्तम अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिलवाया। एक अलग कथा ही इस फ़िल्म की आत्मा थी। वो दमदार होने की वजह से फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर भी कमाकर गई। वैसे तो गिरिश मराठी के ग्लॅमरस अभिनेता नहीं है। लेकिन उनकी अभिनय अदाकारी इस फ़िल्म में लाजवाब रही। ग्रामीण भुमिका में आज गिरिश का हाथ शायद कोई नहीं पकड सकता! उन्होने फ़िल्म के डायलॉग भी जबरदस्त लिखे थे। इस फ़िल्म के बारे मे और एक बात बताना चाहुंगा। ’देऊळ’ ये मराठी की पहली फ़िल्म रही जिस के सेटेलाईट अधिकार एक करोड़ से भी ज़्यादा कीमत में बिके गए। पिछले ही हफ़्ते ’स्टार प्रवाह’ पर यह फ़िल्म अंग्रेजी सबटायटल्स के साथ दिखाई गयी थी। निर्देशक गिरिश कुलकर्णी की ’वळू’ तथा ’विहिर’ के बाद यह तीसरी फ़िल्म रही। उन के पहले शॉर्ट फ़िल्म ’गिरणी’ ने भी सर्वोत्तम ’शॉर्ट फ़िल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया था।

मराठी फ़िल्मों का दर्जा साल-ब-साल बढता ही जा रहा है। आजकल कई बॉलिवूड स्टार्स मराठी सीखकर मराठी फ़िल्में बनाना चाहते है तथा इन में काम करना चाहते है। मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए ये बड़ी गौरव की बात होगी।

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