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सिल्क की अधुरी कहानी

हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों में अक्सर यही देखा गया है की, हिरो की अदाकारी पर ही फ़िल्म चलती हैं। बहुत ही कम मौकात ऐसे आये है, जब फ़िल्म क हिरोईन फ़िल्म चलाती है। इन्ही कुछ फ़िल्मों में ’द डर्टी पिक्चर’ का आज ज़रूर शामिल होगा। जिसे सही तरिके से actress कहा जाए ऐसी बहुत ही कम actress हिंदी फ़िल्मों में आज मौजुद है। शबाना आज़मी, माधुरी दिक्षित, नर्गीस तथा स्मिता पाटिल का जमाना चला ही गया ऐसा लग रहा था। लेकिन आज भी प्रियंका चोप्रा तथा विद्या बालन सही रूप से actress का ख़िताब पहन चल रही है।

’द डर्टी पिक्चर’ जब रिलीज़ हुई तब देखने का मौका नहीं मिला था। लेकिन उसकी डिवीडी रिलीज होने के बाद यह फ़िल्म देखी। विद्या बालन ने सही रूप से सिल्क स्मिता को परदे पर पेश किया है। ’द डर्टी पिक्चर’ जुनुबी भारत की कलाकार सिल्क स्मिता पर आधारित है ऐसा सुना था मगर ये सिल्क कौन है? इसकी जानकारी फ़िल्म देखने के बाद मिली। विद्या ने यह किरदार निभाने के लिए जो मेहनत की है, वो तारीफ़ के काबिल ही है। इससे पहले प्रियदर्शन की फ़िल्म ’भूलभुलैय्या’ में विद्या को actress के रूप में मैने देखा था। विद्या ने किसी चैनेल पर एक इंटरव्ह्यु में कहा था के, सिल्क का रोल मुझे समझ में आया लेकिन सिल्क नही!… सच ही कहा था उसने। फ़िल्म देखकर यह सवाल हर एक के मन में तो ज़रूर आयेगा। फ़िल्म के कई डायलॉग से सिल्क के विचार पहचान आ सकते है। उन्हीं विचारों की वजह से उसकी ज़िंदगी की कहानी शायद अधुरी रह गयी।

शायद इस किरदार की वजह से सिल्क स्मिता का नाम आये तो विद्या बालन का ही चेहरा सामने आता है।

 

मेरी तीन कॉमेडी फ़िल्में

विनोद ही मनोरंजन का सब से बड़ा साधन माना जाता है। मैं भी यही मानता हूं। अधिकतर लोग कॉमेडी फ़िल्में ही देखना पसंद करते हैं। हिंदी फ़िल्मजगत में कही बहारदार कॉमेडी फ़िल्में पिछले कई सालों में आ गई हैं। परेश रावल तथा राजपाल यादव जैसे कलाकारों ने कॉमेडी फ़िल्मों को नया आयाम प्राप्त करके दिया हैं। अगर कोई मुझसे कहे की तुम्हारी पसंद की तीन कॉमेडी फ़िल्में बताओ तो मैं इन तीनों को चुनुंगा-

१.      हंगामा

२.      अंदाज़ अपना अपना

३.      हेराफेरी

सन २००४ मे आयी ’हंगामा’ फ़िल्म मैने देखी हुई सब से कॉमेडी फ़िल्म है। जब यह फ़िल्म रीलीज हुई तब मैं पुणे में इंजिनियरिंग कॉलेज मे पढ़ता था। मुझे इसे थिएटर में देखने का नसीब हासील नहीं हुआ परंतु, होस्टेल पर दोस्तों के साथ मैने इस फ़िल्म का लुत्फ़ उठाया था। ज़्यादा हंसने से पेट दुखता है, ऐसा मैने सिर्फ़ सुना और देखा था। मगर महसूस पहली बार इस फ़िल्म ने कराया। प्रियदर्शन निर्देशित ’हंगामा’ इस साल बाक्स आफिस पर क़ाफ़ी चली थी। फिल्म में दिखाये घटनाक्रम इतनी अच्छी तरह से परदे पर पेश किये गये है, जिस से यह पता चलता है की यह फिल्म किसी कसे हुए निर्देशक ने निर्देशित की है। कॉमेडी फिल्मों मे माहिर प्रियदर्शन ने इसे क़ाफ़ी बारकाई से बनाया है। फिल्म के कलाकार परेश रावल, अक्षय खन्ना, रीमी सेन, आफ़ताब शिवदासानी, मनोज जोशी, शोमा आनंद, संजय नार्वेकर ने अपने कॉमेडी की बहार लाजवाब टाइमिंग से दिखाई है। ’पोच्चकोरू मोकुथी’ नामक मल्यालम फ़िल्म से यह फिल्म बनाई गयी थी। तथा इसी फ़िल्म का रीमेक तमिल में ’कोटीस्वरन मगल’ नाम से और तेलुगू में ’गोपाल राव गरी अम्मई’ नाम से भी हुआ था।

आमीर ख़ान ने बहुत ही कम कॉमेडी फ़िल्में की है। उन मे से ही एक है- ’अंदाज़ अपना अपना’। आमीर तथा सलमान ख़ान के फ़िल्मी करियर की बहुत ही पहले की फ़िल्म ’अंदाज़ अपना अपना’ थी। राजकुमार संतोषी की यह फ़िल्म मैं आज भी देखता हूं तो कभी भी बोर नहीं होता। हंस हंस के लोटपोट करने वाली फ़िल्मों में से ही यह एक फ़िल्म है। करिश्मा कपूर और रविना टंडन के करियर की भी यह बहुत शुरुआती फ़िल्म थी। चारों कलाकार कॉमेडी रूप में इसी फ़िल्म में दिखाई दिये। जब परेश रावल हिंदी फ़िल्मों में खलनायक के रूप में आते थे, उसी दौर की यह फ़िल्म थी। परेश रावल एक कॉमेडी खलनायक के रूप में और डबल रोल में इस फ़िल्म में दिखाई दिये। इन के अलावा शक्ती कपूर, विजू खोटे और ज्युनियर अजित इस फ़िल्म में अच्छे कॉमेडियन के रूप में नज़र आये। आमीर ख़ान तो मेरा सब से फेवरिट कलाकार है, इसलिए यह फ़िल्म भी मुझे सब से पसंद फ़िल्मों में शामिल होती है। इस फ़िल्म मे गीत आज भी मेरी ज़हन में बसे हुए है। राजकुमार संतोषी की सब से बेहतरीन फ़िल्मों में मैं इसे शामिल करना चाहूंगा।

तीसरी फ़िल्म है- हेरा फेरी। आज भी यह फ़िल्म ऑल टाईम फेरविट कॉमेडी फ़िल्मों में शामिल की जाती हैं। नैचुरल कॉमेडी फ़िल्में हिंदी फ़िल्मजगत में बहुत ही कम दिखाई देती है। इसी शृंखला में शामिल हुई यह एक फ़िल्म है। परेश रावल का बाबुराव गणपतराव आपटे का किरदार दर्शक कभी नहीं भुला सकते। परेश रावल के करियर में सब से बेहतरीन रोल मैं इसी रोल को कहुंगा। इसी कारणवश इस फ़िल्म की सिक्वेल ’फिर हेराफेरी’ भी सुपरहिट रही थी। अक्षय कुमार तथा सुनिल शेट्टी की इस मे पहले कई फ़िल्में आयी, मगर सभी ऍक्शन फ़िल्में थी। दोनो ऍक्शन कलाकार पहली बार एक कॉमेडी फ़िल्म में नज़र आये। इस फ़िल्म की सफलता की वजह से दोनों पर लगा ऍक्शन हिरो का सिक्का निकलने में काफ़ी मदद हुई। बाद में दोनों कई बार कॉमेडी फ़िल्मों में दिखाई दिए, तथा दोनों की कॉमेडी फ़िल्मे बाक्स आफिस पर अच्छा काम कर के गई। हर कलाकार के जीवन में कई फ़िल्में ’माईलस्टोन’ बन के रह जाती है। अक्षय, सुनिल तथा परेश के लिए ’हेराफेरी’ एक माईलस्टोन ही थी। प्रियदर्शन निर्देशित यह फ़िल्म मल्यालम सिनेमा ’रामोजी राव स्पीकिंग’ का रीमेक थी। इसी फ़िल्म को तमिल में ’अरंगेत्रा वेलाई’ नाम से बनाया जा चुका है।

 

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’ळ’ का शब्दप्रयोग

देवनागरी को भारत की राष्ट्रीय लिपी कहा जाता है. भारत की कई प्रमुख भाषायें इसी ’रस्मुलख़त’ में लिखी जाती है. जिस में भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत, तथा हिंदी, मराठी, नेपाली, कोंकणी आदि राष्ट्रीय भाषाएं भी शामील है. मतलब भारत की अधिकतम जनता इसी लिपी का प्रयोग अपनी भाषा लिखने के लिए करती हैं.

देवनागरी में ’ह’ के बाद आनेवाला व्यंजन है, ’ळ’. इस अक्षर का प्रयोग आज हिंदी ज़बान में नहीं किया जाता. देवनागरी लिपी इस्तेमाल करने के बावजूद ’ळ’ का प्रयोग हिंदी में क्युं नहीं किया जाता, ये सवाल आज भी मेरे मन में है. अगर संस्कृत की बात की जाए तो, ’ळ’ का प्रयोग केवल वेदों, उपनिषदों तथा पुरानों तक ही सिमित रखा गया है, ऐसा ही मालूम पडता है. वेदों के कई श्लोकों में ’ळ’ का उपयोग दिखाई पड़ता हैं. बोलचाल की संस्कृत में ’ळ’ को शायद निषिद्ध की माना गया है. मराठी तथा सभी जुनुबी हिंद (दक्षिण भारत) की ज़ुबानों की बात की जाए तो यह सभी भाषाएं ’ळ’ का उपयोग अपनी बोलचाल में करती है. यह माना जाता है की, संस्कृत ही सभी भारतीय ज़ुबानों की माता है. इसी वजह से संस्कृत के सभी अल्फाज़ तथा तलफ्फ़ुज़ (उच्चारण) भारत की भाषाओं में मौजुद है. लेकिन शायद ’ळ’ के बारें में यह नियम कतई लागू नहीं होता. हम हिंदी में ’तमिल’ और ’मल्यालम’ कहते है. असल में यह अल्फ़ाज़ वहां की ज़ुबानों में ’तमिळ’ और ’मल्याळम’ है. इस्तेमाल किए जानेवाले अक्षर भले ही अलग हो लेकिन उसका उच्चारण तो ’ळ’ ही होता है. अंग्रेजी में मराठी, कन्नड तथा तेलुगू भाषाओं के लिए यह लब्ज़ L (एल) तथा तमिळ और मल्याळम भाषाओं के लिए zh (ज़ेड़ एच) से दर्शाया जाता है. ’एल’ को हिंदी उच्चारण ’ल’ तथा ’ज़ेड़एच’ का हिंदी उच्चारण ’झ’ के किया जाता है. इसी कारणवश मूल अल्फ़ाज के तलफ़्फ़ुज़ हम कर नहीं पातें.

हाल ही का उदाहरण लिया जाए तो ’kanimozhi’ इस शब्द का उच्चारण हम ’कनिमोझी’ करते है. लेकिन यह बिल्कुल ग़लत हैं. इसे असल में ’कनिमोळी’ पढ़ा जाना चाहिए. मल्याळम में आए ’manichithratazhu’ नामक सिनेमा को हम हिंदीवाले ’मनिचित्रताझु’ से पढ़ते है. असल मे इसका उच्चारण ’मनिचित्रताळ’ है. मराठी भाषा की बात की जाए तो ’ण’ के अलावा ’ळ’ ही ऐसा एक लब्ज़ है, जो किसी भी शब्द के शुरुआत में नहीं आता. इसे किसी शब्द के बीच में या अंत में इस्तेमाल किया जाता है. जैसे केनेपाळ, वाळवंट, पोळी आदि. मराठी भाषा में किए ’ळ’ के उच्चारण को हिंदी में ’ल’ से बोला जाता है. दोनों ज़ुबानों की एकही देवनागरी लिपी होने के बावजूद एक अक्षर को दूसरे अक्षर में परावर्तित करने का ये पहला की मौका होगा! उदाहरण के तौर पर मराठी के ’काळे’ को हिंदी में ’काले’, ’टिळक’ को ’टिलक’, तथा ’कळवण’ को कलवण कहां जाता है.

हिंदी में केवल एक लब्ज़ ना इस्तेमाल किए जाने की वजह से इतने सारे शब्दों के उच्चारण हम भारतीय ग़लत तरिके से करते है. हमे अगर अपनी ज़बान और सुधारनी है तो इस बात को भी सुधारने की भी जरूरत है. ’ळ’ का प्रयोग अगर हिंदी में करना शुरू किया जाए तो शायद इस जुबान की अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में होने वाली दूरी और कम हो सकती है.

 

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मैं और क्रिकेट

एक भारतीय होने के नाते मेरा भी यह फ़र्ज़ बनता है की, मै भी क्रिकेट को सबसे ज़्यादा प्यार करू. इसलिए हर भारतीय की तरह मै भी क्रिकेट का चहिता हूं. बचपन से ही हम क्रिकेट खेलते आये है. लेकिन १९९६ के विश्वकप के बाद मै टीवी पर भी क्रिकेट की मॅचेस देखने लगा. स्वदेश मे हुए इस विश्वकप मे भारत बूरी तरह से श्रीलंका से हार गया था और श्रीलंकाई टीम बहुत तेज़ी से उभर आई थी. विश्वकप के बाद भारतीय टीम मे बहुत से बदल किए गए. राहुल द्रविड और सौरव गांगुली इसी दौरान भारत के राष्ट्रीय टीम मे शामील हुए थे. सचिन तेंडुलकर तो पहले से ही टीम मे थे.
इन तीनों मे से मुझे सौरव गांगुली की बल्लेबाज़ी बहुत अच्छी लगती थी. ख़ास कर उस के ऑफ़साईड मे मारे हुए शॉट्स लाजवाब थे. सभी बल्लेबाजों मे मुझे सौरव गांगुली की ही बल्लेबाज़ी पसंद थी. मै ख़ुद एक दाहिने हाथ का बल्लेबाज़ था, लेकिन गांगुली की तरह बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करने लगा. मै उस की नकल करने की कोशिश करता था. शुरूआत मे मुझे इस तरह बल्लेबाज़ी करना बहुत ही कठीन लगता था. लेकिन सोचता की, सौरव भी तो मूलत: दाहिने हाथ वाला है. अगर वो बाए हाथ से बल्लेबाज़ी कर सकता है तो मै क्यूं नहीं? धीरे धीरे मै बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करने लगा. इसी दौरान मै गेंदबाज़ी की भी प्रॅक्टीस करता था. इसलिए साऊथ आफ़्रिका के एलन डोनाल्ड ने मुझे प्रभावित किया था. गेंदबाज़ी मे मै डोनाल्ड की नकल उतारता था. बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करते रहने की वजह से मुझे दाहिने हाथ से बल्लेबाज़ी करनी बहुत ही आसान लगने लगा था. किसी चीज़ को अगर आप और कठिनाई मे जा कर सोचे तो पहले वाली चीज़ें आसान लगने लगती है. ठीक इसी तरह मेरे साथ भी हुआ. लेकिन मैने इस दौरान दाहिने हाथ से बल्लेबाज़ी के बारे मे सोचा नहीं.
क्रिकेट मे बल्लेबाज़ी से गेंदबाज़ी करना अधिक कठीन होता है. यह बात मुझे समझ मे आई थी. इसलिए बल्लेबाज़ी की बजाए मै गेंदबाज़ी की अधिक प्रॅक्टीस करता था. क्रिकेट मे समझो की गेंदबाज़ी मेरा पॅशन बन गया था. घर पर कोई नही होता तो, किसी दीवार को सामने रखकर वहां गेंदबाज़ी करता था. क्युंकी अकेला आदमी बल्लेबाज़ी की नही लेकिन गेंदबाज़ी की तो प्रॅक्टीस कर सकता है! ऑस्ट्रेलिया के ग्लेन मॅग्रा की गेंदबाज़ी ने मुझे प्रभावित किया था. साधारन गती से केवल लाईन और लेंथ के जोर पर आप कितनी अच्छी गेंदबाज़ी कर सकते है यह मैने मॅग्रा से सीखा. गांगुली रीटायर होने के बाद मैने बाए हाथ की बल्लेबाज़ी छोड दी. आज भी मै क्रिकेट मे गेंदबाज़ी को अपना पॅशन मानता हूं. कल बहुत दिन बाद मैने मैदान पर गेंदबाज़ी की थी. तब यह सब यादें ताज़ा हो गई.
 

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अजब प्रेम की गज़ब कहानी… अंतहीन (ओंतोहीन, অন্তহীন)

नये ज़माने की प्रेम कहानी कैसी हो सकती है? इस सवाल का जवाब ढूंढना है, तो एक बार अंतहीन ज़रूर देखनी चाहिये. सन २००९ में बनी इस बंगाली फ़िल्म को इस साल का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है. इससे ही इस फ़िल्म की काबिलियत समझ में आती है. जब राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा हुई तब श्रेया घोषाल को सब दो गीतों के लिए राष्ट्रीय सन्मान प्राप्त हुआ था. उन मे से एक मराठी फ़िल्म ’जोगवा’ के गाने ’जीव रंगला’ गाना था, तथा दूसरा गाना बंगाली फ़िल्म ’अंतहीन’ से ’फेरारी मोन’ के लिए था. मैं ने यह गाना इटरनेट पर ढूंढ कर सुना तो काफ़ी अच्छा लगा. तभी मैने फ़िल्म देखने का फ़ैसला किया था. जिस फ़िल्म को राष्ट्रीय सन्मान मिला है, उस मे कुछ तो बात होनी चाहिए. फ़िल्म की कथा एक ’रोमॅंटिक स्टोरी’ है और थोडी अजीब भी. जिस में नायक तथा नायिका एक दूसरे को जानते भी है और नहीं जानते भी! जिस में दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करते है और नही करते भी! ऐसी अजीब कहानी लेकर अनिरूद्ध रॉय चौधरी ने इस फ़िल्म का निर्देशन किया है. यह एक प्रकार का इंटरनेट प्यार है. फ़िल्म के हिरो-हिरोईन यानी राहुल बोस और राधिका आपटे ने अपना किरदार बहुत अच्छी तरह से निभाया है. एक पुलिस अफ़सर तथा पत्रकार के बीच होनेवाला प्यार इस फ़िल्म मे दिखाया है. सहाय्यक अभिनेत्री के रोल में अपर्णा सेन और शर्मिला टागौर भी है. लेकिन ’प्राईम फ़ोकस’ तो अभिक (राहुल बोस) और ब्रिंदा (राधिका आपटे) पर ही रहता है. इस प्रेम कहानी का अंत थोडा सा ग़लत ही लगा. और यह लगना स्वाभाविक भी है, क्युंकी हम पारंपारिक प्रेम कहानी की चौकट में जो दबे हुए है. फ़िल्म के गीत बहुत ही अच्छे है. मैंने देखी हुई यह पहली ही बंगाली मूवी थी. वैसे सबटाईटल्स होने की वजह से समझने मे कोई दिक्कत नहीं हुई. बंगाली भाषा अन्य आर्य भाषियों को जल्दी समझ आ सकती है. शायद इस वजह से मैं आगे भी और बंगाली फ़िल्म देख सकू. एक बात तो मैं बताना चाहूंगा के, राधिका आपटे मूलत: पुणे की मराठी लड़की है, लेकिन उसने इस फ़िल्म में बंगाली संवाद अच्छी तरह से बोले है. इसी वजह से मराठियों को बंगाली समझ आने को अधिक दिक्कत नहीं होगी, यह मात्र समझ आया. ’अंतहीन’ को चार राष्ट्रीय सन्मान मिले है. अगर आप एक अच्छी रोमॅंटिक स्टोरी देखना चाहते है तो इस फ़िल्म को ज़रूर देखिये…

 

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