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पुरालेख

एसाइड

महेश मांजरेकर निर्देशित फिल्म ’मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय’ यह मराठी की आजतक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म रही है. मराठी चित्रजगत में नयी क्रांती की शुरुआत इस फिल्म से हुई थी. इस फिल्म के यश स्वरूप मराठी मे कई फिल्में ’मराठी माणूस’ को सामने रखकर बनाई गयी. कुछ फिल्में चली और कुछ नहीं! ’जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा’ यह फिल्म भी इसी ’मराठी माणूस’ के विषय को लेकर बनाई गयी है.

Imageनिर्देशक बने संगीतकार अवधूत गुप्ते की यह तीसरी मराठी फिल्म है. इस से पहले उनकी ’झेंडा’ तथा ’मोरया’ यह फ़िल्में बॉक्स आफिस पर अच्छा करिष्मा दिखा कर गयी थी. विशेषत: दोनो फ़िल्में कुछ न कुछ विवाद में रहने के बावजूद भी अच्छा कमाल दिखा गयी थी. पहले दो फ़िल्मों की तरह अवधूत गुप्ते निर्देशित ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ भी मराठी माटी से तालुक रखती है. इस फ़िल्म में अवधूत गुप्ते सिर्फ़ निर्देशक के रूप से सामने आये है. ऐसा कहा जाता है की, मराठी आदमी सिर्फ़ महाराष्ट्र मे ही अपना धंदा या कारोबार संभाल सकता है. महाराष्ट्र के बाहर वह कुछ भी नहीं कर सकता. इसी थीम को लेकर अवधूत ने  ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ की कहानी लिखी है. इस फ़िल्म में सिरियलों अभिनेता अभिजित खांडकेकर पहली बार रूपेरी परदे पर नज़र आये है. तथा अभिनेत्री प्रार्थना बेहेरे भी इसी फ़िल्म से अपना करियर शुरू कर चुकी है. मराठी में एक्शन हिरो की कमी इस फ़िल्म से फिर एक बार महसूस होती है. मराठी आदमी पंजाब के बठिंडा मे जाकर मराठी ढाबा खोलता है, इसी थीम पर यह फ़िल्म बनाने की कोशिश अवधूत ने की है. लेकिन वह एक प्रेमकहानी बन गयी है. ढाबे को बाजू में रखकर रोमँटिक फ़िल्म की ओर इस फ़िल्म की कहानी चल पडती है. फ़िल्म की शूटिंग पहली बार पंजाब में की गयी है, उसे कई बार पंजाबी टच नज़र आता है. कहानी को देखा जाये तो शायद उस पर ज़्यादा मेहनत लेने की ज़रूरत शायद अवधूत गुप्ते को थी. तभी एक अच्छी फ़िल्म वे बना सकते थे. निर्देशन उनका ठीक है, लेकिन कहानी समझने में ही दर्शक उलझते रहते है. यही इस फ़िल्म की ’कहानी’ है, ऐसा भी हम मान सकते है. अभिजित तथा प्रार्थना का यह ’डेब्यु’ ठीक ही रहा. दमदार एन्ट्री की अपेक्षा हम अभिजित खांडकेकर से कर रहे थे. लेकिन वे भी इस में सफल नहीं रहे.

अवधूत ने पहली बार अपने फ़िल्म को संगीत नहीं दिया लेकिन निलेश मोहरीर ने इस फ़िल्म के संगीत में कोई भी कमी महसूस होने नहीं दी. फ़िल्म के गीत तथा संगीत ही सबसे मज़बूत बाजू है, ऐसा मैं कह सकता हूं. हर एक गीत मौसिकी के नज़रिए से बहुत ही श्रवनीय है. गूरू ठाकूर के गीत हमेशा की तरह याद रहते है. एक बार यह फ़िल्म देखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन शायद कथा सूत्र में उलझना पड सकता है.
मेरी रेटिंग: ३ स्टार, संगीत: ४.५ स्टार.

जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा: रीव्ह्यु

 

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